Tuesday, August 14, 2007

बरगद, इलाहाबाद और नामवर सिंह

(कुछ साल पहले, इलाहाबाद पुरातन छात्र संघ एक पत्रिका 'Under the banyan tree' नाम से निकालता था। यह कुछ समय से नहीं निकल रही है। इसके कुछ लेख प्रो. हरीश्चन्द्र (१९२३-८३) और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को दाखिला कैसे मिला हमने प्रकाशित किये हैं। पिछले साल से इलाहाबाद विश्वविद्यालय 'बरगद' के नाम से पत्रिका निकाल रहा है जिसमें इलाहाबद विश्वविद्यालय और इलाहाबाद के बारे में सूचना रहती है। इसमें छपने के लिये रचनायें, सूचनायें व छाया चित्र आमंत्रित हैं। इसके वार्षिक सदस्य बनें 'बरगद' की वार्षिक सदस्यता ग्रहण करने के लिये छात्र-छात्रायें ५० रूपये (पच्चीस रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) अन्य १००रूपये (पचास रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) बरगद के नाम ड्राफ्ट द्वारा इस पते पर भेजें। सेन्टर आफ फोटोजर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेशन डेलीगेसी परिसर इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद-२११००२ e-mail: bargad@rediffmail.com प्रोफेसर नामवर सिंह को कौन नहीं जानता। उनकी इलाहाबाद की कुछ समृतियां, इस पत्रिका के पहले वर्ष के तीसरे अंक के सौजन्य से हैं।)

हिन्दी का सबसे शक्तिशाली केन्द्र है इलाहाबाद - प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह
हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में प्रो. नामवर सिंह एक लब्ध प्रतिष्ठित नाम है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के संस्थापक व अध्यक्ष रहे नामवर सिंह पिछले पांच दशकों से भी अधिक समय से हिन्दी की सत्ता पर आलोचक के रूप में काबिज हैं। 'छायावाद', 'कविता के नये प्रतिमान', 'कहानी : नयी कहानी', 'इतिहास और आलोचना', तथा 'दूसरी परम्परा की खोज' जैसी कृतियों को देने वाले नामवर सिंह का इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से गहरा रिश्ता रहा है। पिछले दिनों जब हमने स्मृतियां सहेजने का उनसे आग्रह किया तो वे थोड़ी देर तक तो कहीं खो से गये और फिर बोले:

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से जुड़ना मेरे जीवन की महत्वपूर्ण घटना सा रहा है। बात १९४७
के आस-पास की होगी। मेरे मित्र महेन्द्र प्रताप जी बनारस से इण्टर पास करने के बाद बी.ए. करने के लिए विश्वविद्यालय में आये थे। उन्हीं दिनों प्रसंगवश मैं इलाहाबाद आया और प्रयाग में उतरकर सीधे उनके पास के.पी.यू.सी. छात्रावास पहुंचा। वहीं ठहरा भी। एक दिन उन्होंने कहा कि आज डा. राम कुमार वर्मा की क्लास है, मेरे साथ चलो। विश्वविद्यालय की झलक भी मिल जायेगी और वर्मा जी का व्याख्यान भी सुनने को मिलेगा। मैं डा. राम कुमार को कवि के रूप में जानता था। विश्वविद्यालय में टाई-सूट में अध्यापक के रूप में उनकी तस्वीर मेरे लिए नयी थी। इसी तरह महेन्द्र जी के चलते मेरी धर्मवीर भारती, गोपेश, गिरधर गोपाल और विजय देव नारायण साही से मुलाकात हुई। वे एम.ए. करने तक के.पी.यू.सी. छात्रावास में रहते रहे और मैं यहां आता रहा। उन्होंने ही मुझे सर्वेश्वर दयाल, अजित कुमार और ओंकार नाथ श्रीवास्तव से मिलवाया।

मैं यह भी बता दूं कि महेन्द्र प्रताप जी बहुत अच्छे गीतकार थे और सस्वर पाठ करते थे। यहां के बाद वे मुरादाबाद स्थित के.जी. कालेज में अध्यापक हो गये। रिटायर होने के बाद वे मुरादाबाद में बस गये और वहीं उनका देहावसान हो गया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से जुड़ाव तब और बढ़ा जब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आये। शांति निकेतन में रहते हुए ही आचार्य द्विवेदी का सम्बन्ध धीरेन्द्र वर्मा, राम कुमार जी व उदय नारायण तिवारी से हो गया था। यही वजह थी कि उनके काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आते ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग से रिश्ते गहरे हो गये। उन दिनों हमारे यहां श्री कृष्ण राय व छैल बिहारी लाल गुप्त 'राकेश' अध्यापक थे, जिन्होंने पी एच डी व डी फिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया था। मैं वहां अध्यापक हुआ तो उस समय दोनों विश्वविद्यालयों का सम्बन्ध प्रगाढ़ता के चरम पर था। मेरे आने-जाने का सिलसिला अध्यापक के रूप में भी शुरू हुआ। यह क्रम साहित्यिक समारोहों व संगोष्ठियों में भी जारी रहा। उन्हीं दिनों मार्कण्डेय, दुष्यंत व कमलेश्वर से जुड़ा। ये लोग उन दिनों छात्र थे, तब प्रलेस की गोष्ठियों में आते थे। तब ये लोग छात्रावास में रहते थे। मैं ठहरता श्रीकृष्ण दास के यहां था, लेकिन इनसे मिलने गंगा नाथ झा छात्रावास जाता था।

याद आता है कि यूपी कालेज बनारस के मेरे सहपाठी भी यहां पढ़ने आये। वे हिन्दू हास्टल में रहते थे। मैं वहां जाता था। यहां मार्कण्डेय सिंह रहते थे, जो बाद में दिल्ली के ले.गवर्नर हुए। यहीं डा. ईश्वरी प्रसाद के शिष्य रघुबीर सिंह रहते थे, जो बाद में गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के अध्यक्ष हुए। मेरा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से शैक्षिक सम्बन्ध तब और बढ़ा, जब प्रो. रघवंश विभागाध्यक्ष हुए। फिर डा. जगदीश गुप्त और प्रो. रामस्वरूप चतुर्वेदी के समय में यह सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ हुआ। मैं पहले जोधपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का अध्यक्ष बना और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का। उन दिनों मैं यहां बहुत आया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यहां के हिन्दी विभाग की विशेष सहायता के लिए जो कमेटी बनायी, उसमें भी मैं था और मैंने इसकी गौरवशाली परम्परा को ध्यान मेंरखते हुए अनुदान दिलवाया। मुझे गर्व है कि यहां की प्रतिष्ठित निराला व्याख्यानमाला में मुझे भी व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया।

वर्तमान में प्रो. सत्य प्रकाश मिश्र के अध्यक्ष होने के बाद मेरे और हिन्दी विभाग के बीच के सम्बन्धों में और भी प्रगाढ़ता आयी है। वे संयोग से ऎसे समय विभागाध्यक्ष हुए हैं, जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा मिल गया है। सबसे अच्छी बात है कि प्रो. मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और माध्यम पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। देखा जाये तो वे हिन्दी विभाग, भारतीय हिन्दी परिषद और हिन्दी साहित्य सम्मेलन जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के सूत्रधार की भूमिका में हैं। हिन्दी का सबसे शक्तिशाली केन्द्र इलाहाबाद है। इस कारण हम सबकी आकांक्षयें व आशायें इस केन्द्र से हैं। हम चाहते हैं कि इस बात का अहसास इस विश्वविद्यालय को भी हो कि यहां का हिन्दी विभाग कोई छोटी चीज नहीं है और उपेक्षणीय तो बिलकुल भी नहीं। हिन्दी संसार को इस विभाग की केन्द्रीयता का अहसास होना चाहिये। हम सब की आंखे इस पर लगी हैं।

1 comment:

हर्षवर्धन said...

अच्छी जानकारी शुक्रिया

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